Monday, 7 January 2013

दामिनी का शाप

अमानुषो !
दामिनी का शाप
आगे उतरता है!

शुक्ल-रात्रि के समय
जो हैवानियत
जो चरित्र-हीनता
जो निर्लज्जता
तुमने प्रदर्शित की
पचा क्या समाज पाया,
भूल क्या इन्सान पाया?

भले सह ली हो, विवश हो
दामिनी ने;
क्षम्य कब समझी उसने?
शाप जो उस दिन दिया था,
आज आगे उतरता है!

जानते तुम थे
की अबला औ' लाचार
क्या करेगी प्रतिकार
इस लिए
तुमने किया उस पर प्रहार

अमानुषो!
क्यू भूल गये
वो थी जननी का ही रूप
इक बेटी फूल-स्वरुप
इक भार्या सुरूप
इक भगिनी, रक्षणीय
वो तो थी पूजनीय

फिर भी, तुमने
किया दानवो जैसा
दुर-व्यवहार
किया इंसानियत को
शर्मशार
हद हया मरजाद
मिट्टी में मिलाकर
किया तुमने बलात्कार


सुनो, हे अमानुषो!
दामिनी का शाप
आगे उतरता है!

No comments:

Post a Comment