Tuesday, 5 February 2013

देखा है, मैंने देखा है

हाँ! देखा है, मैंने देखा है।

भय को निर्भयता मे सरंक्षित होते
अनन्त अक्षय को क्षरण मे कुलाचे भरते
पराजय को विजय के भाव में बदलते
देखा   है,    मैंने   देखा    है।

अनश्वर को काल कवलित होते
सृष्टा को स्वयं विनाश रचते
ज्योति-पुंजो को अंधकार में गुमते
देखा   है,    मैंने   देखा    है।

शास्त्रों को अज्ञानता में स्खलित होते
धर्म को कट्टरता में पिघलते
नराधमो को इतिहास परिभाषित करते
देखा   है,    मैंने   देखा    है।

शीतलता को दहकते अग्नि में धधकते
मृदुता में कच्चे घड़े को पकते
सरलता में वज्र को सृजित होते
देखा   है,    मैंने   देखा    है।

शीतल नीर को तांडव करते
अटल हिमाद्री को चलायमान होते
ठंडे  रवि को लावे में परिवर्तित होते
देखा   है,    मैंने   देखा    है।

शील को दर्प में चूर होते
विवेक को जड़ता में जड़ होते
कमल पे भ्रमरों को क्षुधा में मडराते
देखा   है,    मैंने   देखा    है।

क्योकि, मै ही जीवन हूँ
मै स्वत: ब्रह्म हूँ ।

Wednesday, 9 January 2013

मकान

सुबह के पांच बज रहे थे। गुलाबी ठण्ड तिस पर घना कोहरा की आँखों को रास्ता न सूझे। आवाज़ गूंजी : ए मंजा , उठ , आज मंडी न जाओगे क्या ? मंजा उठ तो गया था लेकिन आँखे खुली न थी , कथरी में तन छिपाए ठिठुरती आवाज़ में बोला : जाने दो बाबू , आज न जाऊंगा , लगता है जैसे ये जाड़ा प्राण लेके ही जाएगी। फिर से आवाज़ आई : चल उठ, जा , नखरा मत कर । मंजा के पिता की उम्र 40 के आस-पास होंगी लेकिन चेहरे की झुर्रिया कुछ और ही बयां करती ; शायद जिंदगी के संघर्ष ने उन्हें वक्त से पहले ही बूढ़ा कर दिया या फिर शायद उन खेतो को अपने जीवन रस से सींच दिया हो जिनमे कभी कांटे हुआ करते थे गेहूँ और धान की फसले लहलहाती है अब।

मन मार कर बड़-बड़ाता हुआ उठ गया और बोला : बाबू , बोझ तो लदवा दीजिये ; नहीं तो हम ले कैसे जायेंगे? फिर मंजा साइकिल पर बोझ लिए चला जा रहा था मंथर गति से , भाव भंगिमा से लगता जैसे कुछ कठिन विचार किये जा रहा हो। बेचारा तो नहीं कह सकते उसे , कतई नहीं , माना ये जीवन उसकी विरासत है लेकिन उसके बाप ने उसे पढ़ने की पूरी आज़ादी दे रखी थी। जब पढ़ने में जी नहीं लगा तो लगा दिया काम पर उसे भी, उसे अगर पता होता असलियत की एक ऐसा भी दिन आएगा तो थोडा पढ़ ही लेता। पढने में कमजोर नहीं था वो, पड़ोस के चंदू से हमेशा उसके नंबर जयादा आते थे। बस मन ही नहीं लगा आगे पढने में , मेट्रिक के बाद पुस्तैनी खेती में जुट गया, करियर सवारने! अब तो उम्र भी हो चुकी थी , और पिता शादी को जोर दे रहे थे, लेकिन उसने मन में ठान लिया था की जब तक एक पक्का मकान न बनवा ले तब तक शादी नहीं करेगा  । और इस चक्कर में बेचारा अब तक कुंवारा ही था , ईश्वर सबको सब कुछ नहीं देते और देंगे भी क्यों ? यही सब सोचता साइकिल चलाता चला जा रहा था , वैसे अब बचा भी क्या था। नौकरी तो सोने से भी दुर्लभ , घूस-पैरब्बी हो तब न लगे, पहले रेलवे के फॉर्म दिल बहलाने के लिए डाल दिया करता था पर अब उसके लिए भी पैसे खर्चने में परहेज करता।

थोड़ी देर में मंजा मंडी पहुच गया। कल शाम के निकाले ताजा आलू हाथ के हाथ बिक गए। कुछ दिनों से उसके साथ ऐसा ही हो रहा है । सोचा : जाने क्यू उस नास्तिक की भगवान मदद कर रहा है, कभी मंदिर नहीं गया हमेशा गालियां देता रहा उसे और जब उसके बाबू पूजा करते तो उनका उपहास करता, कहता- कभी अपने लिए एक मकान भी मांग लीजियेगा। इन्सान ईश्वर पर नहीं उसके चमत्कारों पे विश्वास करता है और मंजा तो अनोखी बात करता, कहता : मै तो खुद मेट्रिक पास  हु। धकोसले और चमत्कार तो पंडितो के चोंचले है , क्या तेरे भगवान मुझे खाना देते है , अपना हल चलाता हु , मेहनत का खाता हु, अब इसमें कहा से आ गया भगवान? सामान समेट साइकिल पे लाद घर वापस लौटने को निकल पड़ा।

रास्ते में ऊँची दीवारों से घिरी वो शानदार घर दिखाई दी , जिसके बिज़ली के लट्टू पुरे लमही गाँव को अमावस की रातों में रास्ता दिखाया करती थी और साथ ही दिख पड़ा वो किनारा जहा से दीवार पिछली बरसात में ढह गयी थी । वैसे तो बड़े मालिक यहाँ रहते नहीं थे लेकिन हर दशहरा वो जरुर आते, यहाँ की राम-लीला देखने जो की अंग्रेजो के ज़माने से ही प्रसिद्ध है, उनके वैसे तो दो बेटे थे लेकिन बड़ा बेटा लन्डन में रहता था । और छोटा बेटा असमय काल का ग्रास बन गया था। लेकिन उनकी छोटी बहु पति के गुज़र जाने के बाद बड़ी सादगी भरा जीवन काट रही थी। छोटी बहु बहुत दयालु थी , शायद एक-दुसरे का गम जानने के लिए खुद भी गम के सागर में डूबना पड़ता हो, कुछ भी हो लेकिन वैधव्य के भार से दबी हुई छोटी बहु , प्रभु-कीर्तन में लगी रहती थी। उसने तो सती होने की पुरजोर कोशिस की थी, कहा, पति तो निर्दयी ने छीन लिया, आप लोग मुझसे मेरा सती होने का सुख तो मत छीनो, लेकिन बड़े मालिक ने मना कर दिया । बड़े मालिक के इस निर्णय का पुरे गाँव से जम के विरोध किया लेकिन बड़े मालिक बड़े हठी थे, अडिग रहे , तब से सबने हवेली की तरफ देखना भी छोड़ दिया था, सिवाय भूखे-नंगो के। कहा जाता है की बड़े मालिक के परदादा बनारस के राजा के यहाँ चारण हुआ करते थे, काशी-नरेश ने इनकी सेवा-भक्ति से खुश होकर खूब स्वर्ण-ऐश्वर्य प्रदान किया था, और सारा स्वर्ण हवेली में ही सुरक्षित रखा गया था। ये तो बस एक कहानी है, आज के ज़माने में कहा सोना है? और है किसके पास? कुछ तो तुर्की के लुटेरे लुट ले गए बाकि जो बचा था उसे अंग्रेजो ने निगल लिया।

उसकी चाल में आज सुस्ती थी। जाने कितने ख़याल उसके दिमाग में आ रहे थे। जो योजना उसने एक माह पहले बनाया था , आज उसके क्रियान्वन का दिवस था। मन में अनेको बाते उघड़-उघड़ के आ रही थी। उसने फैसला तो पहले ही कर लिया था, अब उसे रात होने का इंतजार था ।

उसने सोचा आज बढ़िया मुनाफा हुआ है, वो सारे पैसे माँ-वाली बक्स में डाल देगा। घर वालो के लिए सौ ग्राम जलेबी ली और फिर अपनी साइकिल संभाल लिया, आज तो सौ ग्राम जलेबी भी एक रूपये के मिलते है पहले तो एक रूपये में किलो से कुछ ज्यादा  ही जलेबिया आती थी, इतना की छक के खाओ तो पेट ही फट जाये लेकिन जलेबी ख़त्म होने का नाम न ले । लेकिन अब ये आलम है की पेट कभी भरता ही नहीं , कुछ भी खा लो और कितना भी खा लो । जाने ये कैसी भूख है और किस चीज़ की?

बहुत कोशिश के बाद भी उसे देर हो गयी थी घर पहुचने में। ठण्ड अधिक थी तो थोड़ा खा-पी के बिस्तरा जमा दिया, चिलम सुलगाया और खो गया सुनहरे भविष्य के कल्पना में। उसका अपना मकान होगा जिसमे वो बड़ा सा फानूस लगवाएगा , बिज़ली के लट्टू रात भर टिमटिमाते रहेंगे किसी तारे की तरह। और फिर वो किसी सुन्दर सी लड़की से ब्याह रचाएगा, उसके 2 सुन्दर-सुन्दर बच्चे होंगे, पहला लड़का दूसरी लड़की आदि-आदि । आज रात वो हवेली को लूटेगा , सोच , उसे बदन में सिहरन सी दौड़ गयी । उसे अब रात के 12 बजे का इंतजार था।

काली रात थी, सब जगह नि:शब्द अँधेरा फैला हुआ था। सब तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था, केवल झींगुरो की आवाज़ ही कर्ण-गोचर जान पड़ती थी। गावं के लोग प्राय: ठण्ड में ज्यादा देर रात तक नहीं जागते थे। सब जगह जीवित जान पड़ने वाली गतिविधिया तक़रीबन बंद हो गयी थी। हवेली भी सुनसान प्रतीत हो रही थी केवल उसके बिज़ली के लट्टू जाग रहे थे, लेकिन उस से मंजा को कोई फर्क नहीं पड़ता। उस काली रात को चीरता मंजा आगे बढ़ा जा रहा था।

मंजा घूम के दीवार के उस किनारे पे जा पंहुचा जहा से दीवार ढह गया था। हवेली में सिर्फ एक चौकीदार नियुक्त था, वो भी ठण्ड के कारण सो रहा था। मंजा को ये बात पता थी इसलिए वो ढहे वाले भाग से प्रवेश किया। उसे  हवेली के नक़्शे के बारे में पूरी जानकारी थी , उसने अपने जीवन के जो कुछ शानदार दावते खायी थी वहा। उसे पता था सोने-गहने कहा रखे है , और उसे तोड़ने का तरीका भी उसे आता था। कहते है की ताकत जंज़ीरो की बेडियों में नहीं सिर्फ बेड़ियों में होती है भले ही वो लोहे की बनी हो या रस्से की। इसलिए तो ताकतवर हाथी भी पतली सी रस्सी के आगे खुद को असहाय पाता  है।

हवेली के हर घर में रोशनदान थी। उसने तय किया की वो रोशनदान से गहने वाले कक्ष में प्रवेश करेगा। और जो कला उसने अपने दोस्तो से सीखी थी वो आज काम में आयेगी आखिर यूही नहीं उसकी पढाई में मन नहीं लगा। मन न लगाने के लिए मन लगाने से दुगना ज्यादा श्रम करना पड़ता है ! उसे कई कलाये आती जो उसने अपनी अध्यापन-कक्ष को छोड़ कर सीखी थी। इसे कदापि गलत सोहबत नहीं कह सकते क्युकी ज्ञान तो ज्ञान है चाहे वो कही से मिले या किसी से भी मिले । खैर, मंजा हवेली में प्रवेश कर चूका था । उसने एक नज़र घर में डाला उसे सब कुछ सामान्य प्रतीत हुआ। फिर उसने अपना धयान उस कक्ष की ओर केन्द्रित किया जिस में गहने वाली आलमारी रखी थी। वो दबे पाँव कमरे में दाखिल हुआ और उसके सामने आलमारी पड़ी हुई थी, उस कमरे में कोई नहीं था अब उसे कोई नहीं रोक सकता था अमीर बनने से, बस एक हाथ की दूरी पर उसका स्वप्न-पूरक वस्तु। बिना देर किये उसने आलमारी को खोला और सारा सोना निकाल लिया फिर अपने साथ लाई थैली को भरने लगा।

पुण्य तो आता-जाता रहता है। लेकिन पाप प्रति-ध्वनित होता है , पाप की गूंज तलहटी के उन पोरों तक जाती है जहा कभी सूरज की किरणे भी मेहरबान नहीं  हुई, इसकी नाद तो बहरों तक को सुनाई पड़ती है। पौ फूटते ही छोटी बहु की नींद टूटी और उन्हें गहनों के कुछ टुकड़े बिखरे मिले। फिर उन्होंने आलमारी वाला कक्ष खोला तो उनकी आँखे फटी की फटी रह गयी। कुछ ही घंटो में चोरी की बात सारे गाँव में फ़ैल गयी । छोटी बहु ने गा-गा कर सबको चोर के कृत्य के बारे में बताया , शायद ही इतना हृदय-स्पर्शी वृतांत किसी ने सुना हो गाँव में अब तक। भोर में ही लोग ऐसे दौड़ पड़े चोर की खोज में जैसे उन्हें कोई मुक्ति-मार्ग मिल गया हो।

रात के दुसरे पहर तक मंजा को भी डर लगने लगा था । उसे समझ नहीं आया की वह क्या करे उस धन के साथ, सोचा की कुँवे में डाल दू लेकिन ये बात उसे बिलकुल रास नहीं आई। उसे एक बात तो पता था की अगर वो गाँव में रहा तो पक्का पुलिस उसे पकड़ के ले जाएगी, शायद मारे भी बहुत , इतना की वो या तो सांस तोड़ दे या फिर हिम्मत, ऐसे में तो उसकी मेहनत व्यर्थ चली जायेगी । उसे पता था की उसके घर की तलाशी ली जाएगी और उसके घर-वालो को भी पिटा जायेगा, गेहू के साथ घुन तो पीसता ही है।

उसके दिमाग में कोई विचार नहीं आया की कहा छिपाए उस धन को, कैसे बचे इस मुसीबत से । अगर धन पकड़ा गया तो उसकी आने वाली पीढ़ी भी उसी की तरह मकान के सपने में गुज़र जाएगी , जाने उनको एक पक्की छत नसीब होगी ? न होगी ?  वैसे भी वो कुछ-एक साल के फिर वापस आ ही जायेगा, जेल में मुफ्त की रोटी तोड़ेगा वो भी पक्की छत के नीचे , ये सोच उसका सीना गर्व से फुल गया । फिर अपनी मूर्खता पर पछताया ।

उसके पास रास्ते कम थे और समय भी। उसने सोचा क्यों ना धन को चार भागो में बाँट दिया जाये और उसे इस तरह से छिपाया जाये की कोई आम आदमी समझ ही न पाए । शायद उसने पुराने ज़माने की वो किताबे पढ़ी थी जिनमे तंत्र-मंत्र और पहेलियो से धन और राज्य का रक्षा किया जाता था । अत: उसने धन के चार हिस्से किये। एक हिस्सा अपने पास रखा और बाकी के तीन हिस्सों को अपनी टूटी मडैया के तीन कोनो पे पेड़ो के मध्य एक विशेष प्रकार से गाड़ दिया। और उसने एक पहेली रचा :

चार खाट के तीन पाँव, लेटे उसपे नट्टा-गिद्ध
तरु हो निर्मल पाय जिन, होय धनपत परसिद्ध 


पहेली को अपने मकान के कच्ची दीवार पे ईट से लिखा और पहेली के नीचे लिखा - 'किसमत पे लात-मंजू'  और अपने भागने की तैयारी में जुट गया। सुबह की बनायीं रोटिया गांठी और धन के चौथे भाग को ले भाग निकला। उसने गाव के बाहर का रास्ता आख्तियार किया, सोचा, कुछ दिन शहर जा के रहेगा और मामला शांत होने पे गाँव आके शेष धन ले जायेगा।
अपनी बुद्धी पे गर्वित, विजय-उन्माद में चूर मंजा चला जा रहा था, कुछ ही मिनटों में वो गावँ के बाहर था। अब उसे कोई भय नहीं था। कोई माई का लाल उसे अब न ही पकड़ सकता था न ही उसे चोर कह सकता था, वो एक आज़ाद पंछी की भांति फनफनाता चला जा रहा था। उसे खुद पे गर्व हो रहा था की जो काम उसके पुश्तो में किसी ने नहीं किया उसने कर दिखाया, अब वो शहर में इक आलिशान मकान बनाएगा जिसकी सारी  दुनिया तारीफों के पुल बांधेगी।

यही भोर के कोई पाँच बज रहे थे और अब तो हवेली भी नहीं दिखाई पड़ रही थी। लेकिन अभी भी  अँधेरा था और थोडा कोहरा भी था। मंजा पगडंडियो को पार कर चुका था, यहाँ से अब वीरान शुरू होता था, शहर कोई 10-11 किलोमीटर दूर था यहाँ से। मंजा खुश था और अकेलेपन को दूर करने के लिये कोई अवधी गीत गाने लगा। इस अँधेरे बियावन वीराने में गीत ही तो उसका मीत था, सो गुनगुनाता बढ़ा चला जा रहा था, इक के बाद इक कदमो को ऐसे बढाता जैसे अभी शहर पहुच जाना चाहता हो। ढलते ठंड रात के साथ उसकी लय-ताल-सुर भी जरा ऊँची हो चली थी।

अचानक उसे इक कर्कश और रोबदार आवाज़ सुनाई दी। आवाज़ आई- किधर  जाता है रे? इधर तो आ जरा हमे भी अपना गान सुना, बड़ा मधुर गाता है तू!  आवाज़ सुन मंजा ठिठक गया, उसने सुना तो था की गाँव उस पार वीराने में डाकू रहते है लेकिन ये सब तो पहनावे से तो लम्पट चोर लग रहे है। मन में हिम्मत धर मंजा बोला: माई-बाप सरकार, शहर को जाते है काम के खोज में,घर से मेहरारू ने लात मार निकाल  दिया है। बोला: सरकार, दया सरकार, हम प्रजा है आपकी सरकार, रहम मई-बाप! चोरो के सरदार ने मंजा की बात सुन थोड़ा खार खाया और मंद आवाज़ में बोला- सुन बे! का लेके जा रहे हो इतनी रात को, बुडबक बनाते हो हमे, चल ला पोटली हमें दे। मंजा खतरा भाप गया, अब तो पोटली छीन जाएगी, सोच, बोला : गरीब की रोटी है सरकार, दया सरकार । मंजा ने अनुमान लगाया की उनकी संख्या तीन है , अगर वो भागना भी चाहे तो भी पकड़ लिया जायेगा, अगर प्रतिरोध करेगा तो शायद हत्या कर दिया जाये। फिर सोचा की अगर वो कही भाग कर छिप सकता है और सुबह होने का इंतजार करे तो शायद बात बन जाये। वैसे किसी ने सच ही कहा है की दौलत का मोह और प्राणों के मोह में दौलत का पलड़ा हमेशा ही भारी होता है। फैसला तो कर लिया था उसने लेकिन अभी चाल चलने की बारी चोरो की थी। सरदार ने फिर तेज आवाज़ में वही दुहराया। अब मंजा के सामने भागने के अलावा कोई चारा नहीं था वो एका-एक उठा और भाग लिया उन घने पेड़ो की ओर। चोरो का सरदार समझ गया की जरुर कुछ गड़बड़ है, पीछा करने का मतलब की ठण्ड में बेवजह नाजुक शरीर को कष्ट देना है, इसके जैसे तो रोज मरते रहते है। फिर उसने चाकू निकाला और दे मारा मंजा को। मंजाके पीठ से खून की धर फूट पड़ी। वही निढाल हो गया किसी पुतले की भांति। मंजा के मुहँ कोई शब्द न निकला, पोटली उसके हाथो से छिटक गयी थी। लेकिन उसकी आँखों के सामने बस एक ही दृश्य झलक रहा था- इक पक्के मकान का।

और इधर ग़ाव में सबको पता चल गया की मंजा ने धन को गावं में ही कही छुपा रखा है। लोगो को उसकी रची पहेली के बारे में मालूम पड़ा । उन्हें पता चला जो उस पहेली को हल कर लेगा उसे सारे धन का पता मिल जायेगा। लेकिन कोई आज तक उस पहेली को हल नहीं कर पाया, और वो पहेली आज भी एक पहेली है , कोई कहता तरु का मतलब पेड़ होता है तो शायद पेड़ के निचे दबा हो, कोई कहता इसका राज प्रेमचंद ( वास्तविक नाम: धनपत राय) के निर्मला उपन्यास में छिपा है, कोई कहता की खाट के चारो पायदानों के तीन पायदानों के नीचे दबा हुआ है, खाट यहाँ पे गिद्धों के आवास को दर्शाता है जैसे की शमशान घाट और उसके एक कोने पर नटराज की मूर्ति होनी चाहिए और जाने क्या-क्या।

अब तो उसे पहेली नहीं एक छन्द की भातीं गाया जाता है । हर उत्सव में उसे छेड़ दिया जाता है। हर लमही-वासी के जबान पर ये पहेली है लेकिन जवाब किसी के पास नहीं। कोई उसका मर्म नहीं जान सका अब तक । शायद इक मकान ही उसकी पहेली थी या फिर पहेली ही मकान !



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Tuesday, 8 January 2013

उठ! खोल मन के द्वार

उठ!
खोल मन के द्वार
बोल मन के विषाद
डर मत!
नियति पाठ पढ़ाती है
क्यूकी
दुसरे को मार्ग दिखाना
होता है, जिन्हें
अपना मार्ग भी स्वयं बनाना
होता है, उन्हें
चल, की तू अकेला नहीं है
तेरे पूर्वजो का पुड्य है, तेरे साथ
भारत का पतन देख रहा, आज तू
क्यूकी, तुझे ही लिखना है
इसके उत्त्थान  का इतिहास
अभी और भी  बहुत कुछ
देखना बाकी  है, चल
चल, भाग यहाँ  से,भाग
चल जा भी , अब

Monday, 7 January 2013

दामिनी का शाप

अमानुषो !
दामिनी का शाप
आगे उतरता है!

शुक्ल-रात्रि के समय
जो हैवानियत
जो चरित्र-हीनता
जो निर्लज्जता
तुमने प्रदर्शित की
पचा क्या समाज पाया,
भूल क्या इन्सान पाया?

भले सह ली हो, विवश हो
दामिनी ने;
क्षम्य कब समझी उसने?
शाप जो उस दिन दिया था,
आज आगे उतरता है!

जानते तुम थे
की अबला औ' लाचार
क्या करेगी प्रतिकार
इस लिए
तुमने किया उस पर प्रहार

अमानुषो!
क्यू भूल गये
वो थी जननी का ही रूप
इक बेटी फूल-स्वरुप
इक भार्या सुरूप
इक भगिनी, रक्षणीय
वो तो थी पूजनीय

फिर भी, तुमने
किया दानवो जैसा
दुर-व्यवहार
किया इंसानियत को
शर्मशार
हद हया मरजाद
मिट्टी में मिलाकर
किया तुमने बलात्कार


सुनो, हे अमानुषो!
दामिनी का शाप
आगे उतरता है!

पीड़ा पीड़ा नहीं लगती

पीड़ा पीड़ा नहीं लगती ,
दुःख दुःख नहीं लगता
टूट रही इन सांसो को अब
और जोड़ने को मन नहीं करता
ये कैसा आभास है, क्या
मृत्य इतनी सुखमय है
विश्वास नहीं कर सकता
अगर ये विश्वास किसी
ने पहले दिलाया होता
तो मेरा भी देश आज़ाद होता!!

पतन निश्चित है समूल

पतन निश्चित है समूल , उस देश का
अगर नहीं किया अनुकरण , तुमने
अपनी संस्कृति औ' मूल्यों का
नहीं मिट सकता कोई भी देश
हो जब मूल्य संस्कृति औ' नारिया सुरक्षित
होती नहीं हानि दुर्जनों की दुर्जनता से
जितनी होती है सज्जनों की निश्क्रियिता से
लेकिन अपने अहंकार में जब कोई
करे माँ ममता मिट्टी का बलिदान
जब स्वार्थ और संकिर्टता
आता हो पहले राष्ट्र हितो से
करो सहस,जागो, कही देर न हो जाये
अक्शुय्य भारत कही फिर से
गुलाम ही न बन जाये
त्यागो अपना स्वार्थ , आओ आगे की
देश के गौरव से बड़ा कोई गौरव नहीं
आओ हम एकत्र हो करे
मिलकर सामना उनका

मनुष्य के सामने

जीवन में मनुष्य के सामने
होते है सिर्फ दो रास्ते
या तो इस जीवन रूपी यज्ञ
का बन यजमान जाये
या फिर इसकी आहुति
अन्य कोई मार्ग है ही नहीं
मनुष्य की मुक्ति का
सत्य और धेय में हो इतनी
क्षमता की , जल की एक बूँद
से हो सके समुद्र का निर्माण