उठ!
खोल मन के द्वार
बोल मन के विषाद
डर मत!
नियति पाठ पढ़ाती है
क्यूकी
दुसरे को मार्ग दिखाना
होता है, जिन्हें
अपना मार्ग भी स्वयं बनाना
होता है, उन्हें
चल, की तू अकेला नहीं है
तेरे पूर्वजो का पुड्य है, तेरे साथ
भारत का पतन देख रहा, आज तू
क्यूकी, तुझे ही लिखना है
इसके उत्त्थान का इतिहास
अभी और भी बहुत कुछ
देखना बाकी है, चल
चल, भाग यहाँ से,भाग
चल जा भी , अब
खोल मन के द्वार
बोल मन के विषाद
डर मत!
नियति पाठ पढ़ाती है
क्यूकी
दुसरे को मार्ग दिखाना
होता है, जिन्हें
अपना मार्ग भी स्वयं बनाना
होता है, उन्हें
चल, की तू अकेला नहीं है
तेरे पूर्वजो का पुड्य है, तेरे साथ
भारत का पतन देख रहा, आज तू
क्यूकी, तुझे ही लिखना है
इसके उत्त्थान का इतिहास
अभी और भी बहुत कुछ
देखना बाकी है, चल
चल, भाग यहाँ से,भाग
चल जा भी , अब
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