Wednesday, 26 December 2012

भूले-बिसरे  

1.
न ही तुमने जिकर किया
न ही हमने जिरह की
लाजिम है की हम अब देखेंगे 

2.
दुनिया की सारी जंगें
सब खुद के अंदर लड़ते हैं ।
बाहर तो बस
खून पसीने के किस्से
लिखते-पढ़ते-गढ़ते हैं ।

3.
तुम कहते हो की कुछ बात करो , बोलो तो
हज़ार बातें हैं , तुम सुन नहीं पाओगे
तुम कहते हो की गिले शिकवे , गिला करो
हज़ार शिकवे हैं तुम फिर न आओगे

4.  
तेरे होंठ बहुत खुश्क खुश्क रहते हैं
कभी तेरे लबो पे ताजी शायरी हुआ करती थी

ये तेरे होंठो पे तराने किसके हैं?
 

काश
 
काश काश ......
कोई नगमा मेरा होता
शब्दों में पिरो जिसे
होठो पे सजा लेता

काश काश ......
कोई कमलनी अधखिली होती
भवरा बन उसे
खुशिया देता, करता सिंदूरी

काश काश ....
कोई समझा होता, जाना होता
न होते हम अग्रसर, मधुशाला
धुत, पी रहे भर-भर के हाला

संसार के विद्रूप मायाजाल में
तुमी एकमात्र सत्य थे
लेकिन टुटा मेरा भरम
हम अब रहे नहीं हम
सवाल-जवाब 
तुम ही उत्तर हो
हर एक प्रश्न का मेरे
नित नवीन शब्दों में पिरो
जिसे
हसरत से पूछा हमने
अब भी
जिज्ञासा से पिपासु हु
आश है
मेरे मन की पपड़ियो को
माघ पूष के बाद
फिर सावन आएगा
और तुम
तब तो बरसोगी?
कुछ नीर मिल जायेगा
इन नयनो को
प्रश्नों के पुलिंदो को
फिर
उम्मीद मिल जायेगा
पेश करेंगे फिर
तुमे हम
क्युकी
तुम ही उत्तर हो