प्रकृति लेती है परीछा
मनुष्य की योग्यता का
साधना की अग्नी में जला
तू खुद को की अग्नि
सोने को खरा करती है
खुद को तपा इतना
की न बन पाए सूरज
तो दीपक जरुर बनना
मनुष्य की योग्यता का
साधना की अग्नी में जला
तू खुद को की अग्नि
सोने को खरा करती है
खुद को तपा इतना
की न बन पाए सूरज
तो दीपक जरुर बनना
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