Tuesday, 5 February 2013

देखा है, मैंने देखा है

हाँ! देखा है, मैंने देखा है।

भय को निर्भयता मे सरंक्षित होते
अनन्त अक्षय को क्षरण मे कुलाचे भरते
पराजय को विजय के भाव में बदलते
देखा   है,    मैंने   देखा    है।

अनश्वर को काल कवलित होते
सृष्टा को स्वयं विनाश रचते
ज्योति-पुंजो को अंधकार में गुमते
देखा   है,    मैंने   देखा    है।

शास्त्रों को अज्ञानता में स्खलित होते
धर्म को कट्टरता में पिघलते
नराधमो को इतिहास परिभाषित करते
देखा   है,    मैंने   देखा    है।

शीतलता को दहकते अग्नि में धधकते
मृदुता में कच्चे घड़े को पकते
सरलता में वज्र को सृजित होते
देखा   है,    मैंने   देखा    है।

शीतल नीर को तांडव करते
अटल हिमाद्री को चलायमान होते
ठंडे  रवि को लावे में परिवर्तित होते
देखा   है,    मैंने   देखा    है।

शील को दर्प में चूर होते
विवेक को जड़ता में जड़ होते
कमल पे भ्रमरों को क्षुधा में मडराते
देखा   है,    मैंने   देखा    है।

क्योकि, मै ही जीवन हूँ
मै स्वत: ब्रह्म हूँ ।

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